Chhoti si baat छोटी सी बात

 Chhoti si baat छोटी सी बात


सानिया अपने अम्मी अब्बू की तीन संतानों में सबसे बड़ी थी। अम्मी-अब्बू उसे बहुत प्यार करते थे। उन्होंने सोचा था कि सानिया को खूब पढ़ाएंगे और सानिया की हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते थे। सानिया के अब्बू तो उसे इतना प्यार करते कि उन्होंने सानिया के नाम से ही अपनी दुकान का नाम रखा हुआ था।
  
सानिया छठवीं कक्षा में पढ़ती थी । पढ़ाई में तेज़ थी इसलिए हमेशा अध्यापिकाओं की आँख का तारा रही थी ।  हालाँकि सानिया  आत्मविश्वासी लड़की थी किंतु उसे एक बात में हमेशा शर्म आती थी। वह बात थी उसके पिता का चिकन शॉप चलाना । सानिया  एक अच्छे नामी -गिरामी स्कूल में पढ़ती थी । यहाँ अधिकतर बच्चे अमीर परिवार से आते थे।  किसी के पिता बड़े डॉक्टर तो किसी के पिता बड़े इंजीनियर ! ऐसे में सानिया को पिता का चिकन शॉप चलाना बिलकुल न भाता था । 



एक दिन सानिया ने अपने अब्बू से कहा- "अब्बू! तुम ये चिकन शॉप चलाना बंद क्यों नहीं कर देते ? 

अब्बू ने मुस्कराते हुए कहा," अच्छा ! तो अब्बू अपनी प्यारी सानिया को खाना कहाँ से खिलाएंगे? और अच्छे-अच्छे खिलौने कहाँ से दिलाएँगे?"

सानिया-"लेकिन देखो न अब्बू ! मेरे साथ के किसी भी बच्चे के मम्मी-पापा चिकन शॉप नहीं चलाते । कोई इंजीनियर हैं तो कोई डॉक्टर! अब्बू आप भी कुछ दूसरा काम कर लो। 


अब्बू बोले," मेरी गुड़िया ! मैं तुम्हें इसीलिए तो अच्छे स्कूल में पढ़ा रहा हूँ कि तुम पढ़-लिख कर कोई अच्छा काम कर सको। मैं तो बहुत गरीब परिवार में पैदा हुआ था। बचपन में ही मेरे अब्बू का इंतकाल हो गया था। पढ़ने का मौका ही न मिला । अब चिकन शॉप से ही गुजारा चला रहा हूँ ।  मेरी प्यारी बिटिया रानी,अब तुम पढ़ो और आगे बढ़ो।" 

अब्बू के उपदेश सुनकर सानिया चुप हो गई। लेकिन उसे हमेशा पिता के ऐसा काम करने की वजह से हीन भावना आ जाती। जब भी साथ के बच्चे अपने  मम्मी-पापा के काम करने की बात करते तो सानिया बात बदल कर कुछ और बात करने की कोशिश करती। 

एक दिन हिंदी की नई अध्यापिका आई । वह सबसे उनका परिचय पूछने लगीं । साथ में वह बच्चों से पूछती जाती कि किस बच्चे के मम्मी-पापा क्या काम करते हैं । यह सब देख कर सानिया  के मुँह में घबराहट आ गई। अब जब  सानिया से पूछा जाएगा कि उसके पापा क्या काम करते हैं? तो क्या जवाब देगी? सब लोग हँसने लगेंगे, जैसे ही सुनेंगे कि सानिया के पिता चिकन काटते हैं । सानिया का मुँह घबराहट में पीला पड़ने लगा। वह प्रार्थना करने लगी कि जल्दी ही घंटी बज जाए और नई अध्यापिका कक्षा से बाहर चली जाए। 

तभी सानिया का नम्बर आ गया। वह घबराहट से भर उठी। अध्यापिका ने उसका नाम पूछने के बाद उसके मम्मी-पापा के बारे में पूछताछ शुरु कर दी। सानिया पहले तो थोड़ी देर चुप रही। फ़िर जैसे एक साँस में बोली," मेरी मम्मी घर में रहती है और पापा चिकन शॉप चलाते हैं। 

अध्यापिका ने जैसे सुना ही नहीं। वह दोबारा पूछने लगी । सानिया को काटो तो खून नहीं । उसे लग रहा था मानो घड़ों ठंडा बरफ़ीला पानी किसी ने उस पर उँडेल दिया हो । उसे लग रहा था कि सारी कक्षा उसी की तरफ़ देख कर उसके पिता के चिकन शॉप होने की बात पर हँस रही है। यह टीचर भी  दोबारा क्यों पूछ रही है? 

सानिया ने दोबारा पूरी हिम्मत बटोर कर कहा, " अब्बू की चिकन शॉप है।" 

अध्यापिका- " अच्छा ! क्या खुद की शॉप है।" 

सानिया -"जी हाँ!" 

अध्यापिका- " ओहो! तो तुम्हारे पिता खुद का व्यवसाय करते हैं ! वे एक बिज़नेसमैन हैं।" 

सानिया  आश्चर्यचकित रह गई। उसने अपने पिता के व्यवसाय को कभी सम्मान की नज़रों से नहीं देखा था । आज अध्यापिका ने सिर्फ़ एक छोटी सी बात कह कर उसके आत्म-सम्मान को बढ़ा दिया था। सानिया सोचने लगी कि वह नाहक ही अपने पिता के व्यवसाय की वजह से उन्हें छोटा काम करने वाला समझती थी और हीनता महसूस करती थी । उसने कभी अपने पिता को व्यवसायी की तरह नहीं सोचा था। सानिया को समझ आ गया कि कोई काम छोटा और बड़ा  नहीं होता। छोटी और बड़ी हमारी सोच होती है।
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